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रूट कनाल क्या है?

डाक्टर पन्नू:- दाँत की बाहरली लौट के नीचे और दाँत के निचली नरम जगह, जिस को गूदा कहा जाता है उस में दाँत की दौड़ूँ, रगों, नाड़ियाँ और रंग रहित तरल पदार्थ होता है हैं। रूट कनालज़ बहुत छोटी होती हैं, छोटे छोटे खाने, जो ऊपर वाले गूदा चेंबर में से निकल के रूट के सिरे तक आते हैं। एक दाँत में कम से कम एक और चार से ज़्यादा रूट कनाल नहीं होता है।
रूट कनाल के इलाज की ज़रूरत क्यों है?
डाक्टर पन्नूक्योंकि दाँत आपने आप ठीक नहीं होगा, इलाज कराए बिना समीपता फैलेगी, दाँत के आस आसपास हड्डी की पर्त ख़राब होगी और दाँत निकल भी सकता है। दाँत का दर्द आम तौर पर बढ़ जाता है, जब किसी को तत्काल तौर पर दाँत की तरफ ध्यान देने के लिए मजबूर होना पड़ता है। आम तौर पर इस दर्द से छुटकारा सिर्फ़ दाँत निकलवाने साथ ही होता है, जिस के साथ समीप के दाँत थोड़ा इधर उधर हो जाता है हैं और कोई चीज़ खाने में परेशानी होती है। हालाँकि दाँत कढवाउना बहुत सस्ता है, परन्तु उस के बाद खाली हुई जगह पुर करन की ज़रूरत होती है, जो कि रूट कनाल के इलाज की अपेक्षा भी महँगी साबित हो सकती है। अगर आपकी इच्छा हो, आपका अपना असली दाँत सुरिक्खत रखना सब से बढ़िया विधि है।
दाँत दर्द क्यों महसूस हन्दा है?
डाक्टर पन्नू – जब गहरी खोह या फ्रेकचर होने साथ गूदो में समीपता लग जाती है, जिस के साथ बैक्टीरिया के जरासीम अंदर दाख़िल हो जाता है हैं, या सदमो कारण ज़ख़्म हन्दा है, तो यह नष्ट हो सकता है। नुक्सान होने वाले या नष्ट हुए गूदो कारण ख़ून के बहाव और सेल्युलर की हरकत में विस्तार हो जाता है और दाँत के अंदर से पैन वाले दबाव से कोई आराम नहीं मिल सकता। दाँत में आम तौर पर दर्द तब महसूस होता है, जब कोई चीज़ खायी पैदा हुई, चबाी पैदा हुई या गर्म या ठंडे खानीं का प्रयोग की पैदा हुई।
रूट कनाल ट्रीटमेंट किस तरह किया जाता है?
डाक्टर पन्नू – रूट कनाल अमल, ख़राब हुए गूदो की सफ़ाई करके और कनाल को फिर सही शकल देके दाँत के रूट कनाल में ख़राब या नष्ट हुए गूदे को बचाने के लिए किया जाता है। दाँत को फिर से लगन वाली समीपता को रोकनो के लिए, उस में हुए सुराख़ को रबड़ जैसे पदार्थ गट्टा -पर्चा के साथ भरा जाता है। फिर दाँत को किसी चीज़ के साथ सोने या बढ़िया किस्म की मिट्टी के साथ स्थायी तौर पर बंद कर दिया जाता है। इस तरह मरीज़ असली दाँत को सुरक्षित करन के योग्य हो जाता है हैं। जब आपका दाँतों का आम डाक्टर दाँत के सभी टैस्ट पूरे कर लेता है और इलाज की सिफ़ारिश करता है। सब से पहले, आपको स्थानिक ऐनसथैटिक देके प्रभावित जगह को सुन्न करना होगा। फिर एक रबड़ शीट दाँत के आस आसपास बिछाकर उसे अलग करना पड़ेगा। इस के बाद गूदो के चेंबर में, समीपता वाली किसी रूट कनाल के साथ ऊपर से सुराख़ करके सारा ख़राब गूदा पूरी तरह साफ़ करके सही शकल दी जाऐगी। बैक्टीरिया का मुकाबला करन के लिए इस जगह अंदर दवा भी पाई जा सकती है। दाँत की हालत और निर्भर करते फिर समीपता होने से रोकनो के लिए, इस के अतिरिक्त सिरे को आरज़ी तौर पर बंद किया जा सकता है, या द्रव के निकास के लिए दाँत को खुला छोड़ा हुआ जा सकता है या दाँतों का डाक्टर आगे वाली कार्यवाही कर सकता है और खोहों को भर सकता है।

मुँह और दाँतों की बीमारियाँ क्या हैं?

डाक्टर दलवीर सिंह पन्नू
मुँह, लाखों सूक्ष्म जीवाणुओं (जरासीमों) का घर है। दाँतों से पलाक और ओर नरम गन्द -मंद को हटाते दाँतों के ब्रुश, बैक्टीरिया, ख़ून, लार, मुँह के गन्द -मंद और टूथपेस्ट के साथ भर जाता है हैं। इस करके, आम तौर पर यह तजवीज़ किया जाता है कि दाँतों के ब्रुश को, ब्रुश करन से पहले नलके पानी के साथ अच्छी तरह धोओ। सीमित खोज से पता लगा है कि अच्छी तरह धोने के बाद भी दाँतों के ब्रुश साफ़ नज़र आने के बावजूद संभावित तौर पर सूक्षम पैथोजैनिक जीवाणुओं के साथ भरे हो सकता है हैं। इसके प्रतिक्रिया के तौर पर दाँतों के ब्रुश का प्रयोग करते, इसको साफ़ रखने, समीपता से बचाने या जीवाणआं से पूरी तरह मुक्त रखने के कई तरीके तैयार किये गए हैं।

दाँतों के ब्रुश की तजवीज़ संभाल
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दाँतों का ब्रुश किसी ओर को न बरताव दो, न प्रयोग। जिस्म की लार एक दूसरे के अंदर जाने की ऐसी सांझ के साथ, दाँतों के ब्रुश को सांझे तौर पर बरताव वालों को समीपता का और ज्यादा ख़तरा होगा, यह कमज़ोर रोग -रोधक सिलसिले या समीपता वाली बीमारी वाले व्यक्ति के लिए ख़ास तौर पर विचार का एक महत्वपूर्ण पहलू होगा।
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ब्रुश करन बाद में, आपने दाँतों के ब्रुश में से टूथपेस्ट और गन्द -मंद निकालना यकीनी बनाने के लिए, इसको नलके पानी के साथ अच्छी तरह साफ़ करों, हवा में सूखने दो और इसको सीधा रखो। अगर एक ही जगह पर ज़्यादा ब्रुश रखे जाता है हैं, तो उन को एक दूसरे के साथ न लगन दो।
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दाँतों के ब्रुश को समीपता लगन से बचाने वाले घोल या माउथ -वाश में डुबाउण की ज़रूरत नहीं है। दरअसल, इस तरह करन के साथ, वही घोल को काफ़ी समय तक या कई लोगों की तरफ से इस्तेमाल करे जाएँ करके दाँतों के ब्रुश पर ओर जीवाणु लगन का ख़तरा बन जाता है।
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दाँतों के ब्रुश को समीपता से मुक्त करन के लिए बर्तन धोने वाली मशीन, माइक्रोवेव या अलट्रा -वायलट उपकरणों का प्रयोग की भी ज़रूरत नहीं है। ऐसे करन के साथ दाँतों का ब्रुश ख़राब हो सकता है।
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दाँतों के ब्रुश को रोज़ ढक्कन या बंद डिब्बों में रखने की ज़रूरत नहीं है। ऐसी स्थानों (एक नमी वाले माहौल), छुट हवा दे मुकाबला बैक्टीरिया दे पनपण के लिए और ज्यादा अनुकूल हैं।
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आपने दाँतों के ब्रुश को हर 3-4महीनों में या उसके बाल टूटने या फैलने से पहले ही बदल दो। अमरीकन डैंटल एसोसिएशन की तरफ से गई सिफारिश मुताबिक, दाँतों के ब्रुश के ख़राब होने की संभावना और इसके प्रभाव के कम होने पर अधारित है, न कि बैक्टीरिया करके इसके ख़राब होने के कारण।
दाँतों के ब्रुश को समीपता -मुक्त रखने के लिए ज़रूरी चीजें खरीदने या प्रयोग के फ़ैसले पर अच्छी तरह विचार किये जाने की ज़रूरत है, क्योंकि इस समय वैज्ञानिक लिखतें, इस कार्यवाही की हिमायत नहीं करती।

 

नकली दाँत -पीहड़ क्या है?

डाक्टर पन्नू – एक दाँत या बहुत से दाँतों को स्थिर या एक बदलने योग्य कृत्रिम हिस्के साथ बदला जा सकता है। टूट चूे दाँत या बहुत से दाँतों को, बदलने योग्य नकली दाँतों के साथ बदला जा सकता है। मुंकमल दाँत -पीहड़ सभी दाँतों की जगह ले सकती है, जबकि आंशिक दाँत -बीड़ एक से ले कर कई दाँतों की जगह लगाई जा सकती है।

 नकली पीहड़ का इतिहास क्या है?

 डाक्टर पन्नू – ख़राब हुए या कढवाए हुए दाँतों की जगह नये नकली दाँत लुआउण का सिलसिला हज़ारों वर्षों से चला आ रहा है। लगभग 700 बीसी से हाथी दाँत और हड्डी का प्रयोग करके बहुत ही कारीगरी के साथ नकली दाँत तैयार किये जाता है थे। परन्तु बदकिसमती के साथ लगभग 1800 ईस्वी तक इस स्तर की प्रौद्यौगिकी लुप्त हो गई। मध्यकालीन समय दौरान नकली दाँत बीड़ूँ की तरफ कम ही ध्यान दिया गया। दाँतों दरमियान दूरी बढ़ना स्वाभाविक थी और माने माने व्यक्ति भी इस से प्रभावित थे। मलिका ऐलज़ाबिथ पहली ने लोगों सामने अपनी ख़ूबसूरती बरकरार रखने के लिए आपने मुँह विचलित फ़रकों को कपड़े के साथ भरवायआ थे। जब नकली दाँत -बीड़ूँ लगाईं गई, तो उहुनें को हाथों के साथ बनाया गया और रेशम के धागों के साथ बांधा गया। परन्तु दाँतों को रोकी रखना बहुत मुश्किल था, क्योंकि मुँह में कई दाँत कम जाता है थे और जो नकली दाँत बीड़ का पूरा सैट डालते थे, उन को कोई चीज़ खाने से पहले उन को लगाना पड़ता था। ऊपर वालों और नीचे की प्लेटों पूरी तरह फिट नहीं बैठतीं थे और स्टील के स्प्रिंगों के साथ उन को जोड़ा जाता था। यहाँ तक कि जॉर्ज वाशिंगटन दाँतों के टूटने और अनमेल दाँत -बीड़ करके परेशान थे। मुख्य कारण यह था कि प्रौद्यौगिकी के मानक में कोई विकास नहीं हो सका, क्योंकि नकली दाँतों के लिए उचित पदार्थ की खोज बहुत मुश्किल था।

प्राचीन समय दौरान नकली दाँतों के लिए ज़्यादातर आम सामग्री पशूओं की हड्डी या हाथी दाँत, विशेष कर हाथियों या दर्यायी घोड़े के लिए जाती थी। मानवीय दाँतों का प्रयोग भी होती थी। मरे हुए व्यक्तियों के मुँह में से निकालकर या गरीब लोगों की तरफ से अपने मूँहों में से कढवाके बेचे गए दाँतों की भी प्रयोग की जाती थी। यह दाँत जल्दी ही बात जाता है थे या ख़राब हो जंादे थे। अमीर लोगों के पास चाँदी, सोने, असली मोतिया या सुलेमानी नगों की बना अधिक उपज नकली दाँत -बीड़ूँ होती थीं।

1700 ईस्वी में इन समस्याओं का हल भी ढूँढना शुरू हो गया।1774 में दुशातियू और दुबायस की शेमंत ने नकली दाँतों के मुकम्मल सैट तैयार किये, जो ख़राब नहीं होता है थे। उन को बढ़िया किस्म की मिट्टी (पोरसिलेन) के साथ बनाया गया था। 1808 में ग्युसेपांगेलो फ़ौजी ने स्टील पीने साथ इक्कमातर पोरसिलेन दाँत तैयार किया। 1837 में क्लाडियस ऐश ने एक ओर बढ़िया किस्म का पोरसिलेन दाँत तैयार किया। 1800 ईस्वी में नकली दाँतों के सैट अमरीका में आए। उन को बाज़ार में बड़े पैमाने पर भेजा गया।

परन्तु असली कामयाबी तब मिली, जिस समय पर गंधकयुकत रबड़ ढूँढा गया। यह बड़ा सस्ता और सामग्री के साथ इस्तेमाल करे जाएँ में आसान था, जिस को मुँह के आकार अनुसार फिट किया जा सकता था और दाँतों के सैट को स्थिर रखा जा सकता था। एक ओर सस्ती सामग्री भी तैयार की गई ; इस में सैल्यूलायड का प्रयोग कीया गया। सैल्यूलायड को रबड़ की जगह इस्तेमाल करन की कोशिश की गई, परन्तु यह प्रयोग में आने वाली बढ़िया सामग्री सिद्ध नहीं हो सकी। आजकल दाँतों के नकली सैट प्लास्टिक या सिरामिक के बनाऐ जाता है हैं।

 दाँतों के नकली सैट किस तरह बनाऐ जाता है हैं?

 डाक्टर पन्नू – दाँतों के नकली सैट दो तरह के होता है हैं, एक दाँतों का मुकम्मल सैट और दूसरा आंशिक सैट। मुकम्मल सैट मुँह के ऊपर वाले और या निचले हिस्के सभी दाँतों का बदल है। आंशिक सैट एक या कई दाँतों की जगह लगाया जाता है। मुकम्मल दाँतों का नकली सैट मुँह में हवा खींच कर टिकाया जाता है। कुछ मामलों में जब यह विधि संभव न हो, तो दाँतों के सैट के साथ करीम का प्रयोग ज़रूरी हो जाती है। आंशिक सैट धातु की चिटकनियों की मदद के साथ बाकी के स्थिर दाँतों के आसपास कस्सके ख़राब हो किये जाता है हैं। दाँतों के आंशिक सैट न दिखाई देने वाली चिटकनियों के साथ भी मुँह अंदर टिकाऐ जा सकता है हैं, जो कुदरती दाँतों जैसे ही लगते हैं। दोनों तरह की नकली दाँत -बीड़ूँ की बनावट लगभग एक ही सी होती है।

मसूड़ों की सोज़

बच्चों को लगन वाली सब से अधिक आम बीमारी कौन सी है? कैंसर, पोलियो, एडज़, कुपोषण?

डाक्टर पन्नू – नहीं, यह है मसूड़ों की सोज़, जिसको कि मसूड़ों का फुल्लना भी कहा जाता है। एक अन्दाजे मुताबिक 98 प्रतिशत नौजवान व्यक्तियों के कुछ दर्जे तक मसूढ़े फूलते हैं। हालाँकि बच्चों में मसूड़ों की सोजिश के साथ शायद ही कोई गंभीर समस्या, जैसे कि दाँतों का पके तौर पर टूटना होती है, परन्तु यह बच्चों के नौजवानी में कदम रखने दौरान सब से अधिक गंभीर होती है। पहले से मौजूद दाँतों की सोजिश, हारमोनों में तबदीली के समय दौरान तेज़ हो जाती है, हालाँकि यह किशोर अवस्था के बाकी के सालों में धीरे -धीरे कम हो जाती है।

मसूड़ों की सोजिश के मुख्य कारण क्या हैं?

डाक्टर पन्नू – मसूड़ों की सोजिश, दाँतों पर बैक्टीरिया वाले पलाक के जन्म कारण होती है। यह पलाक, बैक्टीरिया और इसके साथ ख़राबी करन वाले जीवाणुओं, जो बाद में कुछ जटिल तबदीलियाँ के द्वारा, मसूड़ों में से ख़ून बहने का कारण बनते हैं, के बढ़ने -फुल्लण के लिए पैदा होने वाले आधार के तौर पर काम करता है।जब ब्रुश करन के साथ मसूड़ों में से ख़ून निकलता है, तो यह इस बात का साफ़ संकेत है कि मसूढ़े फूे हुए हैं और मसूढ़े सुज्जे हुए हैं। अगर आपके बच्चो के मसूड़ों में से ख़ून निकलता है, तो परेशान होने की ज़रूरत नहीं ; बाकायदगी के साथ सही तरीको साथ दाँत साफ़ करन के साथ पलाक हट जाऐगा, ख़ून बहना बंद हो जाऐगा और मसूड़ों की सोजिश ठीक हो जाऐगी।

अपंग बच्चों बारे क्या राय है?

डाक्टर पन्नू – जो बच्चे, जिस्मानी या दिमाग़ी तौर पर अपंग होता है हैं, उनके लिए रोज़ ब्रुश करना मुश्किल होता है, तो घर में उन की मदद साथ साथ मसूड़ों की सोज़ को रोकने या इसके इलाज के लिए बिजली के साथ चलने वाले दाँतों के ब्रुश और ग़रारे करन वाले बैक्टीरिया रोकने वाले घोल का प्रयोग की जा सकती है।

मसूड़ों की बीमारी को कैसे रोका पैदा हुई और इन का इलाज कैसे किया पैदा हुई?

डाक्टर पन्नू – खुशकिस्मती के साथ, मसूड़ों की सोज़ का एक साधारण सा हल है: मुँह की अच्छी तरह साफ़ -सफ़ाई। रोज़ ब्रुश करना और कुल्ला करन के साथ सिर्फ़ मसूड़ों की सोज़ से ही बचाव नहीं होता, बल्कि सब से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस के साथ दाँत भी ख़राब नहीं होता है, और दाँतों की लम्बी मियाद की समस्याएँ पर भी कंट्रोल होता है। बच्चा जब दाँतों के फलास्स (दाँतों में फिरने वाला रेशम का धागा) का प्रयोग करन लायक बड़ा हो, तो इसकी हफ़्ते में कम से -कम दो या तीन बारी प्रयोग शुरू करनी चाहिए। दाँतों के ब्रुश की तरह ही फलास करना भी मुँह की अच्छी सेहत के लिए ज़रूरी है और इसको एक आदत बनाया जाना चाहिए। ख़ून बहने या मसूड़ों की सोजिश हों या न होने के बावजूद कम से -कम हर छह महीनों बाद जांच और दाँतों की सफ़ाई के लिए दाँतों के डाक्टर के पास जाना चाहिए। यह भी ज़रूरी है कि बच्चा इस बात को जाना है कि सभी दाँतों को ब्रुश करना ज़रूरी है, सिर्फ़ सामने वाले दाँतों को नहीं।

दाँतों की खोह क्या होती है?

डाक्टर पन्नू – दाँत की खोहों, दाँत की दो ऊपर वाली लौटूँ में होती हैं, जिन को जोड्ध और दाँत -सार कहा जाता है। जोड्ध, ऊपरी सख़्त लौट और जोड्ध के बिल्कुल नीचे पिल्ली लौट दाँत -सार होती है। यह दोनों लौटूँ दाँत के अंदरूनी टिशू को सुरक्षित रखते हैं, जिस को गूदा कहा जाता है, जहाँ ख़ून की नाड़ियाँ और दौड़ूँ होती हैं। दाँतों में खोहों (कैवीटीज़) आम हैं, जिन से 90% आबादी प्रभावित है। छोटी खोहों कारण पीड़ा नहीं होती और मरीज़ का इन की तरफ ध्यान नहीं जाता। बड़ी खोहों में ख़ुराक जमा हो सकती है और प्रभावित दाँत का अंदरूनी गूदा ज़हरीले बैक्टीरिया के साथ तकलीफ़ -देह बन सकता है, ठंडियें, गर्म, कमाया हुआ या मीठी चीजों के साथ दाँतों में पीड़ा होती है। इन बड़ी खोहों करके दाँतों में होने वाली पीड़ा, डाक्टर के पास जाने वाले कारण में से एक है।

 दाँतों में खोहों होने के क्या कारण हैं?

 डाक्टर पन्नू – आम मीठाे करके मुँह में बैक्टीरिया बंदा है, जो तेज़ाबी पपड़ी बन जाती है। तेज़ाबी पपड़ी, पैरीयो -डौंटल पपड़ी से अलग हन्दी है, जिस करके मसूढ़ो की बीमारी होती है। इन बैक्टीरिया की तरफ से बनाई गई तेज़ाबी पपड़ी, जोड्ध की जड़ लौटूँ को सख़्त और दाँत की निचली पिल्ली लौट दाँत -सार को नरम करती है। नरम अधिक उपज लौटूँ, मुँह की लार के साथ घुल जातीं हैं और दाँत में एक सुराख़ बना देती हैं। अगर दाँतों के डाक्टर की तरफ से इस को भरा न पैदा हुई, तो खोह, दाँत के अंदरूनी गूदे को लगातार खोरदी रहती है और नुक्सान पहुँचा सकती है। गूदे को नुक्सान होने साथ गूदा नष्ट हो सकता है, इस को समीपता लग सकती है और दाँत में पीक पड़ जाती है। इस लिए गूदे को नुक्सान होने के कारण ज़रूरी है कि या तो दाँत कढवाउना पड़ेगा या जहाँ से नष्ट हुआ गूदा हटाना है और शिथिल पदार्थ के साथ तबदील किया जाना है, के लिए रूट कनाल अमल कराउना पड़ेगा।

 क्या बच्चों को खोहों ज़्यादा होती हैं?

 डाक्टर पन्नू – बच्चों के दूध के दाँतों की ऊपरी सफ़ेद सख़्त जोड्ध कच्ची और मुसामदार होती है। मुसामदार सफ़ेद जोड्ध को ओर परिपक्व,घनी, सख़्त, चमकदार सख़्त जोड्ध बनने के लिए सात साल लग जाता है हैं। इस लिए बालिग़ों के मुकाबले बच्चे इन के ज़्यादा शिकार बनते हैं।

 क्या हम खोह बनाने वाले बैक्टीरिया को आसानी के साथ हटा सकता है हाँ?

 डाक्टर पन्नू – खोह बनाने वाले बैक्टीरिया को ख़त्म करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि वह बिल्कुल वही तरह के नुक्सान न पुचाउण वाले बैक्टीरिया हैं, जो मुँह के अंदर खोह में रहते हैं। खोह बनाने वाले कई बैक्टीरिया में शामिल हैं:

 1. लैकटोबैसीलस ऐसिडोफिलस बैक्टीरिया दाँतों की पदार्थ दाँत वाली लौटूँ के टोयें और दरारें में रहते हैं। यह बैक्टीरिया 3-12 सालों की उम्र के छोटे बच्चों में दाँतों को लगातार नष्ट करन का कारण बनते हैं। खोहों दूध के दाँतों और लगभग 6सालों की उम्र में निकलने वाली पक्वताीया दाढ़ों, दोनों में खोहों बनने का कारण बनते हैं।

 2. छह किस्मों के स्ट्रेप्टोकोकस दाँतों की साईडें और नरम लौटूँ पर हमला करते हैं। यह साईडें आम तौर पर साथ लगते दाँतों को छोहन्दियें हैं और इन साईडें पर बनने वाली का पता लगाना बहुत मुश्किल होता है। इन खोहों का सिर्फ़ एक्सरे के इस्तेमाल के साथ ही अच्छी तरह पता लगाया जा सकता है।

 3. ओडोनटोमाईसिस विसकोसिस बैक्टीरिया ज़बान के पीछे रहते हैं और दाँत की बाहर निकली हुई जड़ पर हमला करते हैं। सिमैंटम, दाँत की जड़ की बाहरली सख़्त लौट है (दाँत की निचली दो तिहाई जड़, जो आम तौर पर दाँत की हड्डी में दबी होती है), बुज़ुर्ग मरीज़ों और मसूढ़े की बीमारी से प्रभावित मरीज़ों में दाँत की जड़ और सीमेंट बाहर नज़र आने लगती है और इन बैक्टीरिया दे हमला का शिकार बंदी है।

 

 दाँत पीसना क्या है?

 डा: पन्नू – बरकसिज़म को आम करके दाँत दाँत पीसना के तौर पर भी जाना जाता है, दरअसल अतिरिक्त और निचले जबड़ों का इकट्ठा ढिंढोरे, अतिरिक्त जबाड़े के दाँतों के साथ निचले दाँतों को दाँत पीसना है। दाँत दाँत पीसने की बीमारी अलग अलग अधिअनों के आधार पर 10 -50% जनसंख्या को होती है। आम तौर पर दाँत दाँत पीसना, एक अचेत व्यवहार है, इस लिए कई लोगों को पता ही नहीं लगता कि वह ऐसे कर रहे हैं ! अक्सर उन का साथी उन को बताता है कि रात को वह दाँत दाँत पीस रहा /रह था। फ़िल्हाल कि दाँत जागद्यें भी दाँत पीसे जा सकता है हैं, परन्तु दाँत दाँत पीसने का कार्य आम तौर पर रात को होता है। नींद दौरान दाँत काटने की ताकत (वह ताकत, जिस के साथ दोनों जबाड़े इकठ्ठा होता है हैं) हमारे जागण के घंटों दौरान पड़े दबाव से छह गुणा अधिक हो सकती है, नतीजे के तौर पर रात के समय पर के बरकसिज़म (दाँत दाँत पीसना) के साथ हमें बहुत चोखा नुक्सान होने की और ज्यादा संभावना है।

दाँत पीसने के क्या नतीजे हैं?

डा: दलवीर सिंह पन्नू – दाँत दाँत पीसने साथ पीड़ा हो सकती है और मसूढ़े और मुँह की ओर चीजें ख़राब हो सकतीं हैं। इन में शामिल हैं:

मुँह के चारा दुखने, सिर पीड़ा और कान दुखने

रोटी खाने के लिए इस्तेमाल करे जाता है चारा ही दाँत दाँत पीसने का कारण बनते हैं। इस करके प्रातःकाल यह चारा दुखते या नरम महसूस होता है हैं। इस करके जबड़ा सख़्त लगता है और हाथ लाने पर, मुँह दोनों तरफ़ टस टस करता है। पठ्यों की इस पीड़ा को अक्सर सिर पीड़ा, दाँत पीड़ा या धौण में दर्द का नाम दिया जाता है।

ख़ूबसूरती को शख्सियतें दाँत पीसने साथ दाँत पिघलने करके बहुत छोटे हो सकता है हैं और इस के साथ इन की ख़ूबसूरती ख़त्म हो सकती है।

संवेदनशील दाँत

दाँत दाँत पीसने साथ क्योंकि दाँत की पर्त ख़त्म हो जाती है और दाँतों के नुक्सान हो सक्कण वाली लौट पर आ जाती है। इस करके दाँत ठंडे, दबाव और सर्द गर्म के लिए संवेदनशील हो सकता है हैं।

दाँतों और भराई में दरार पडनी

दाँत दाँत पीसने साथ ज़्यादा दबाव पड़ता है और इस के साथ दाँतों में दरार आ सकती है और दाँतों की भराई भी टूट सकती है।

जबड़ों के जोड़ को नुक्सान

दाँत दाँत पीसने साथ जबड़ों के जोड़ को नुक्सान हो सकता है। यह वह ‘‘कब्ज़ा है, जो निचले जबाड़े को अतिरिक्त जबाड़े के साथ जोड़दा है, जिस के साथ खाने पीने का अमल और बातचीत की जा सकती है।

क्या दाँत पीसने की बीमारी बच्चों को भी होती है?

डा: पन्नू – बच्चों में दाँत दाँत पीसने का अमल अक्सर देखा जाता है। बच्चे आपने दाँतों को ठंड या कानों की लागें जैसी ओर बीमारियाँ लगन कारण, दर्द और बेचैनी करके दाँत दाँत पीसते हैं। आम तौर पर बच्चे अलरजियों कारण बेचैनी से छुटकारो के लिए आपने दाँतों को घिसाउंदे हैं। आम तौर पर बच्चों में दाँत दाँत पीसने की बीमारी एक थोड़े समय का नशा है और बड़े ढिंढोरे इस से निजात पाई जा सकती है और वह भी उस के दाँतों पर बुरा प्रभाव डाले बिना।

दाँत पीसने की बीमारी का इलाज कैसे किया पैदा हुई?

डा: पन्नू – अगर आपको शक है कि आपको दाँत दाँत पीसने की बीमारी है, तो आपने दाँतों के डाक्टर के पास जाओ। अगर दाँत दाँत पीसने के आपके लक्षण हुए, तो वह आपको दस सकता है। बहुत से मामलों में, आपके सोने के समय दौरान यह आपके लिए मुँह के कस्टम गार्ड पैदा कर सकता है हैं। मुँह का गार्ड, उस स्थिति को ज़र्दा है, जिसको दाँत दाँत पीसने दौरान आपके दाँतों को सहनी पड़ेगी। इस के साथ दाँत दाँत पीसने की बीमारी के साथ कम से कम नुक्सान होगा। इस से अलावा, आपका दाँतों का डाक्टर आपको आपने दाँत और जीभ को सही स्थिति में रखने बारे बताकर मदद कर सकता है, जिससे आपका दाँत दाँत पीसना कम पैदा हुई। शराब की मात्रा भी कम करन की सलाह दी जाती है, क्योंकि शराब पीने साथ दाँत दाँत पीसने की बीमारी के ओर बढ़ने का पता चला है। सभी लोग यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि दबाव और बेचैनी, दाँत दाँत पीसने की बीमारी में बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर आपको दाँत दाँत पीसने की बीमारी है, तो अपनी ज़िंदगी में दबाव को बेहतर ढंग के साथ कम करन की कोशिश करों। दबाव की अच्छी तरह निगरानी और इस पर कंट्रोल के साथ आप अक्सर नाटकीय ढंग के साथ दाँत दाँत पीसना कम कर सकता है हो।

 

होंठ और मुँह का कैंसर क्या है?

 

डाक्टर पन्नू – होंठ और मुँह की खोह का कैंसर एक बीमारी है, जिस में कैंसर के घातक सेल होंठ या मुँह के रेश्यों में पहुँच जाता है हैं। मुँह में ज़बान के सामने का दो तिहाई हिस्सा, अतिरिक्त और निचले मसूढ़े, गाल और होंठों की अंदरूनी लाइनिंग,ज़बान के नीचे मुँह का निचला हिस्सा, मुँह का ऊपरी हड्डी वाला हिस्सा और अक्ल दाढ़ों का थोड़ा सा पिछला हिस्सा शामिल होता है।

मुँह का कैंसर किस को होता है?

डाक्टर पन्नू – सिर और गर्दन के बहुत से कैंसर अक्सर 45 सालों से ज्यादा उम्र के व्यक्तियों में होता है हैं। होंठ का कैंसर औरतों के मुकाबले मर्दों में आम होता है और इसके हलके रंग की चमड़ी वाले व्यक्तियों में होने की ज़्यादा संभावना होती है, जो बहुत समय धूप में रहते हैं। मुँह की खोह का कैंसर उन्होंने व्यक्तियों में आम तौर पर ज़्यादा होता है, जो तम्बाकू चबाते हैं या तम्बाकूनोशी करते हैं।

डाक्टर को कब मिलना चाहिए?

डाक्टर पन्नू – जब किसी व्यक्ति को आपने होंठ, मुँह या मसूड़ों में गिल्टी दिखाई दे, मुँह में जलन महसूस हो, या मुँह में दर्द होता हो, तो उसको डाक्टर को मिलना चाहिए। जब नकली दाँतों का सैट मुँह में अच्छी तरह फिट न होता हो, तो यह मुँह या मसूड़ों के कैंसर का एक ओर संकेत हो सकता है। दाँतों के माहिर डाक्टर की तरफ से दाँतों की जांच करन समय, होंठ और मुँह की खोह के कैंसर का पता लग जाता है। अगर ऐसे लक्षण होने, तो डाक्टर शीशे या रोशनियों का इस्तेमाल करके मुँह की जांच करेगा। डाक्टर मुँह का एक्स -अरे कराने के लिए कह सकता है। अगर आम तौर पर टिशू नहीं ढूँढता, तो डाक्टर को टिशू का छोटा सा टुकड़ा काटने की ज़रूरत पड़ेगी और कैंसर के किसी सेल का पता लाने के लिए, इस को जांचण के लिए वह ख़ुर्दबीन के नीचे रख कर देखेगा। इस को बायओपसी कहा जाता है। बायओपसी वाली जगह से मरीज़ का थोड़े समय के लिए ध्यान हटाने के लिए (स्थानिक ऐनेस्थेटिक) दिया जाऐगा, ताकि कोई दर्द महसूस न हो। डाक्टर गिल्टियों का पता लाने के लिए मरीज़ के गले को भी अच्छी तरह टोह कर देखेगा। बीमारी से मोड़े की संभावना इस बात पर निर्भर करती है कि होंठ या मुँह में कैंसर किस जगह पर है, क्या कैंसर सिर्फ़ होंठ में या मुँह में ही है या दूसरे टिशूआं (पड़ाव) में भी फैल गया है और मरीज़ की सेहत की आम हालत क्या है।

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